कहउँ कहाँ लगि नाम बड़ाई।
रामु न सकहिं नाम गुन गाई ॥ ( बालकाण्ड , श्रीरामचरितमानस )
( नाम की महिमा कहाँ तक और कितनी कहूँ ,नाम इतना बड़ा है कि स्वयं राम भी अपने नाम के गुण पूरी तरह नहीं गा सकते।)
किसी भी स्तोत्र की शक्ति का अनुमान उसके छन्दों की संख्या से नहीं, बल्कि उस अडिग विश्वास से लगाया जाता है, जो युगों तक भक्तों के हृदय में जीवित रहता है। श्री विष्णु सहस्रनाम सदियों से केवल पढ़ा नहीं जा रहा है, अपितु भारतीय जनमानस की चेतना में एक जीवित परंपरा की भाँति प्रवाहित हो रहा है। प्रश्न यह है कि आखिर इसमें ऐसी कौन-सी शक्ति है कि राजाओं से लेकर संन्यासियों तक, गृहस्थों से लेकर विद्वानों तक, सभी ने इसे अपना आश्रय पाया?
शायद इसका पहला कारण इसका उद्गम है। यह किसी एक साधक की निजी अनुभूति नहीं, बल्कि महाभारत के उस निर्णायक क्षण की देन है, जब धर्मराज युधिष्ठिर ने समस्त मानवता की ओर से प्रश्न किया —
"किमेकं दैवतं लोके? किं वाप्येकं परायणम्?" -महाभारत, अनुशासन पर्व
(मनुष्य किसका आश्रय ले? किसका स्मरण उसे भय, शोक और भ्रम से परे ले जा सकता है?)
पितामह भीष्म का उत्तर था, “भगवान विष्णु के सहस्र नामों का जप।”
नाम जप की शक्ति
विष्णु सहस्रनाम केवल इसलिए शक्तिशाली नहीं कि इसका ज्ञान भीष्म पितामह ने दिया। अपितु, इसकी शक्ति इस बात में है कि इन एक हज़ार नामों में ईश्वर का कोई एक रूप नहीं, बल्कि जीवन के असंख्य सत्य निहित हैं। कभी वे "भूतभव्यभवत्प्रभुः" ( जो अतीत, वर्तमान और भविष्य तीनों के स्वामी), बनकर समय से परे सत्ता का बोध कराते हैं, कभी "शरणम्" बनकर आश्वस्त करते हैं कि इस जगत में मनुष्य अकेला नहीं है, कभी "वासुदेवः" बनकर स्मरण दिलाते हैं कि वही परमात्मा समस्त प्राणियों में व्याप्त है। श्रीमद् भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं:
"सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः।" -श्रीमद् भागवत गीता 9.14
(अर्थात्, जो भक्त निरंतर मेरा कीर्तन करते हैं, वे दृढ़ संकल्प के साथ मुझमें स्थित होते जाते हैं। )
विष्णु सहस्रनाम इसी निरंतर स्मरण की साधना है। बार-बार श्रीहरि के नामों का जप करने से मन स्थिर होता है, विचारों की अव्यवस्था क्रम में बदलने लगती है और भय के स्थान पर विश्वास जन्म लेने लगता है।
यही इसकी वास्तविक शक्ति है। विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र कोई तात्कालिक चमत्कार का वचन नहीं देता; यह मनुष्य को भीतर से बदलता है। वह मन, जो परिस्थितियों का दास था, धीरे-धीरे साक्षी बनना सीखता है। जो जीवन केवल संघर्ष प्रतीत होता था, उसमें संरक्षण का भाव जागता है। और तब सहस्रनाम केवल एक स्तोत्र नहीं रह जाता, वह जीवन जीने की एक कला बन जाता है।
जब हम किसी स्तोत्र या मंत्र को "शक्तिशाली" कहते हैं, तो प्रायः हमारे मन में किसी चमत्कार की छवि उभरती है, जैसे कोई मंत्र पढ़ते ही विपत्ति टल जाए, या कोई पाठ करते ही धन-समृद्धि द्वार पर आ खड़ी हो। यह समझ स्वाभाविक है, और भारतीय जनमानस में सदियों से इस प्रकार की मान्यताएँ रही भी हैं। परंतु यदि हम विष्णु सहस्रनाम की "शक्ति" को केवल इस दृष्टि से देखें, तो शायद हम उसके सबसे महत्वपूर्ण आयाम से ही चूक जाएँगे। इस स्तोत्र का प्रमुख प्रभाव तो यह है कि ये कई स्तरों में जीवन को बदलता है।
इसीलिए, विष्णु सहस्रनाम अत्यंत शक्तिशाली है क्योंकि वह मनुष्य को ईश्वर के निकट लाने से पहले, उन्हें स्वयं अपने भीतर के भय, अशांति और विस्मृति से मुक्त कर देता है।
"शक्ति" का अर्थ क्या है?
पहला स्तर
- सामान्यत: माना जाता है कि इस स्तोत्र का पाठ करने से चित्त शांत होता है, बाधाएं टलती हैं, और जीवन के चारों ओर एक रक्षा-घेरा सा बन जाता है।
दूसरा स्तर
- दार्शनिक पक्ष: इस स्तोत्र की गहराई इसमें है ,कि यह एक ही सर्वोच्च तत्व को सैकड़ों रूपों, नामों और दृष्टिकोणों से समझने का रास्ता खोलता है।
तीसरा स्तर
- सामाजिक फैलाव: सदियों से यह स्तोत्र अलग-अलग परंपराओं को जोड़ने वाला सेतु रहा है, चाहे अद्वैत मार्ग हो, द्वैत हो, या वैष्णव भक्ति-धारा, सभी ने इसमें अपने-अपने ढंग से अर्थ पाया है।
विष्णु सहस्रनाम: भिन्न दृष्टियाँ, एक सत्य
विष्णु सहस्रनाम पर समय-समय पर कई विद्वानों ने अपनी टीकाएँ लिखीं, और हर एक की दृष्टि अलग थी। आदि शंकराचार्य ने इसे अद्वैत के भाव से देखा, उनके लिए श्रीविष्णु स्वयं ब्रह्म हैं, कोई अंश नहीं। श्रीरंगम के पराशर भट्ट ने अपनी टीका "भगवद्गुण दर्पण" में विशिष्टाद्वैत की दृष्टि अपनाई ।यहाँ भगवान के गुण भक्त को उनकी ओर खींचते हैं, प्रेम और मिलन की ओर ले जाते हैं। और माधव-परंपरा में विद्याधिराज तीर्थ की टीका द्वैत दृष्टि से लिखी गई, जहाँ माना गया कि हर एक नाम के भीतर अनंत अर्थ छुपे हैं।यही इस स्तोत्र की सच्ची विशेषता है कि यह किसी एक विचारधारा तक सीमित नहीं रहा। जैसे कई नदियाँ अलग-अलग दिशाओं से बहती हैं, पर अंत में एक ही सागर में मिल जाती हैं । वैसे ही अलग-अलग विचारों की धाराएँ भी विष्णु सहस्रनाम में आकर मिल जाती हैं। हर परंपरा को यहाँ अपनी जगह मिली, और कोई भी इससे दूर नहीं हो सका।
जो युगों से अटल है, वही है विष्णु सहस्रनाम की शक्ति
जैसे प्रकृति का स्वभाव है, वह यह नहीं देखती कि कौन-सा बीज किस वृक्ष का है, वह तो हर बीज को समान धरती, समान जल, समान सूर्य का प्रकाश देती है, और हर बीज अपनी प्रकृति के अनुसार फलता-फूलता है, ठीक उसी तरह ही विष्णु सहस्रनाम भी, किसी कल्पवृक्ष की भाँति, हर साधक को उसकी श्रद्धा के अनुरूप फल देता आया है। साधक मान्यता अनुरूप जिस संप्रदाय या विचार को हो या फिर वह जिस भाव से जप रहा हो इसका प्रभाव हमेशा समान ही रहता है। यही कारण है कि सम्पूर्ण भारतवर्ष में, सदियों से, इस दिव्य स्तोत्र को पूरे हृदय से अपनाया गया।

