जब हम किसी प्राचीन और गहन रचना से परिचित होते हैं, तो मन में स्वाभाविक ही यह जिज्ञासा उठती है, इसका स्रोत क्या है, किन परिस्थितियों में इसका प्रादुर्भाव हुआ, किस क्षण इसका बीज पड़ा और किस सांस्कृतिक-आध्यात्मिक भूमि में इसकी जड़ें गहरी हुईं ?

विष्णु सहस्रनाम के संबंध में भी यही स्वाभाविक प्रश्न मन में उठते हैं। इस प्रश्न का उत्तर किसी कोरी कल्पना में नहीं, बल्कि सनातन धर्म के सबसे महान ग्रंथ ‘’ महाभारत’’ के हृदय में सुरक्षित है।

( कुरुक्षेत्र में विष्णु सहस्रनाम का उपदेश देते पितामह भीष्म )

महाभारत का प्रसंग - भीष्म और युधिष्ठिर

कुरुक्षेत्र का युद्ध लगभग समाप्त हो गया था। धर्मराज युधिष्ठिर जिन्हें अपने ही गुरुजनों, भाई-बंधुओं के विरुद्ध शस्त्र उठाना पड़ा। इस पीड़ा ने उनके मन में प्रश्न खड़े किए, वास्तविक धर्म क्या है? यदि धर्म के लिए ही इतना संहार करना पड़ा, तो उस धर्म का मूल्य क्या है? और इस भीषण नरसंहार के बाद, शांति कैसे प्राप्त होगी? इसी समय, श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को भीष्म पितामह से आध्यात्मिक दीक्षा प्राप्त करने का आदेश दिया।

युधिष्ठिर भीष्म पितामह के पास गए, जो शरशय्या पर लेटे अपने अंतिम क्षणों की प्रतीक्षा करते हुए श्रीकृष्ण के ध्यान में लीन थे। भीष्म पितामह के चरणों में बैठकर युधिष्ठिर ने कुछ सीधे प्रश्न किए:

किमेकं दैवतं लोके?
इस संसार में एकमात्र सर्वोच्च आराध्य देवता कौन हैं?
किं वाप्येकं परायणम्?
मनुष्य का परम आश्रय, अंतिम शरण और जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य क्या है?
स्तुवन्तः कम्?
मनुष्य किसकी स्तुति करे?
कमर्चन्तः?
किसकी उपासना और आराधना करे?
प्राप्नुयुर्मानवाः शुभम्?
किसकी स्तुति और आराधना से मनुष्य को कल्याण, मंगल और जीवन की श्रेष्ठ सिद्धि प्राप्त होती है?

आरँभ एवं प्रथम पाठ

उत्तर देते हुए भीष्म पितामह बोले कि सर्वश्रेष्ठ, सबसे शुभ, देवताओं के प्रमुख और सभी प्राणियों के पिता वही हैं जो परम हैं - श्री विष्णु।

इसके बाद, पितामाह ने श्री विष्णु के दिव्य नामों का गुणगान करते हुए विष्णु सहस्रनाम का उच्चारण किया। इन दिव्य नामों के श्रवण में लीन पांडव स्तोत्रम् को लिख या स्मरण नहीं कर सके। जब युधिष्ठिर ने बाद में अपने भाइयों से पूछा, तो किसी को भी स्तोत्रम् याद नहीं था। चिंतित होकर, पांडवों ने समाधान के लिए श्रीकृष्ण की ओर देखा।

श्रीकृष्ण ने बताया कि पूरे ब्रह्मांड में केवल एक ही दिव्य शक्ति हैं जो पांडवों को विष्णु सहस्रनाम का स्मरण करने और दोहराने की शक्ति दे सकते हैं - महादेव। बिना समय गंवाए, सहदेव ने अपनी स्फटिक माला, जो क्रिस्टल मोतियों से निर्मित एक जप माला थी, लेकर भगवान शिव की प्रार्थना शुरू कर दी। स्फटिक माला में यह अद्भुत गुण होता है कि यह शांत वातावरण में ध्वनि को अपने भीतर समाहित कर सकती है। इसी गुण के कारण, महादेव की कृपा से सहदेव धीरे-धीरे पूरे सहस्रनाम को वैसा ही दोहरा सके जैसा पितामह भीष्म ने सुनाया था।

श्री विष्णु सहस्रनाम - संरचना, छंद और श्लोक संख्या

शास्त्रों में रचित प्रत्येक स्तोत्र एवं स्तुति, छंद तथा व्याकरण को ध्यान में रखते हुए लिखी गई है। विष्णु सहस्रनाम एक सुगठित व्याकरण रचना है, जिसके हर भाग का अपना उद्देश्य है, अपनी गरिमा है।

यह स्तोत्र तीन भागों में विभक्त है: पूर्वभाग, स्तोत्रभाग, और उत्तरभाग।

इसके अलावा इस स्तोत्र में सात ध्यान श्लोक हैं जिनकी सहायता से हम भगवान के स्वरूप पर ध्यान कर सकते हैं। तीनों भाग मिलकर विष्णु सहस्रनाम को पूर्ण करते हैं। यद्यपि जप के लिए मात्र मूल सहस्रनाम का ही प्रयोग किया जाता है ।

पूर्वभाग

यह भाग पाठक को उस गंभीर प्रसंग से परिचित कराता है जिसमें यह स्तोत्र अवतरित हुआ। युधिष्ठिर के प्रश्न, पितामह भीष्म की अवस्था, और उस दिव्य संवाद की पृष्ठभूमि का वर्णन इसी भाग में मिलता है।।

स्तोत्रभाग

मूल नामावली में एक हज़ार नाम अनुष्टुप छंद में रचित एक सौ सात श्लोकों में वर्णित हैं। प्रत्येक नाम परमात्मा के किसी एक विशेष गुण की स्तुति है। हर श्लोक में दो पंक्तियाँ हैं और प्रत्येक पंक्ति में दो चरण हैं।

अनुष्टुप छंद

यह सम्पूर्ण स्तोत्र अनुष्टुप छंद में रचित है जिसके प्रत्येक चरण में आठ अक्षर होते हैं। प्रत्येक पंक्ति में सोलह अक्षर होते हैं, और प्रत्येक श्लोक में कुल बत्तीस अक्षर होते हैं।

उत्तर भाग या फलश्रुति

इस भाग में स्तोत्र के जप की महिमा बतायी गई है। शास्त्रों में कहते हैं कि किसी भी मंत्र या सहस्रनाम का पाठ तीन प्रकार से किया जा सकता है, उच्च स्वर में (वाचिक जप), मन ही मन, धीमे स्वर में (उपांशु जप) और मानसिक रूप से (मानसिक जप)। यह विशेषता इस स्तोत्र को और अधिक सुलभ बनाती है। वाचिक, उपांशु, और मानसिक प्रत्येक अवस्था में, हर परिस्थिति में यह स्तोत्र लाभदायी है।

विष्णु सहस्रनाम के प्रकार

सनातन धर्म की एक अद्भुत विशेषता यह रही है कि उसने सत्य को एक ही रूप में बाँधकर नहीं रखा। यहाँ एक ही प्रार्थना अनेक परंपराओं में नया विस्तार पाती है। श्री विष्णु सहस्रनाम की परंपरा भी इसी क्रम का अनुसरण करती है। श्री विष्णु के सहस्र नामों का उल्लेख पद्म पुराण, स्कन्द पुराण, नारद पुराण और गरुड़ पुराण जैसे अनेक ग्रंथों में विभिन्न पाठ-रूपों में प्राप्त होता है।

विष्णु सहस्रनाम हमें स्मरण करवाता है कि जीवन की सबसे विकट परिस्थितियों में भी मनुष्य के पास एक ऐसा नाम, एक ऐसा आश्रय और एक ऐसी चेतना उपलब्ध है, जो उसे बिखरने नहीं देती।