‘’श्री विष्णु से बढ़कर कोई आश्रय नहीं, उनके नामों से श्रेष्ठ कोई मार्ग नहीं, और उनके निरंतर स्मरण से बढ़कर परम शांति का कोई साधन नहीं।’’ —भीष्म, अनुशासन पर्व, महाभारत
भारतीय परंपरा में नाम का विशेष महत्व है। नाम केवल पहचान का माध्यम नहीं है, बल्कि वह व्यक्ति या परम सत्ता के गुणों और स्वरूप का प्रतिबिंब माना जाता है। इसलिए जब हम उस परम सत्ता का वर्णन करने का प्रयास करते हैं, जो असीम और अनंत है, तब कोई एक नाम उसकी महिमा को पूर्णतः समेट नहीं सकता। उनके नाम भी अनगिनत होंगे।
इसी कारण भारतीय शास्त्रीय परंपरा में सहस्रनाम की परंपरा का उद्भव हुआ। एक हज़ार नाम, एक ही परम सत्ता को हज़ारों दृष्टिकोण से देखने का माध्यम हैं। हिंदू धर्म में प्रत्येक देवी-देवता को समर्पित एक सहस्रनाम उपलब्ध है। इन्हीं में से एक है विष्णु सहस्रनाम, जो भगवान विष्णु के एक हज़ार नामों के माध्यम से उनके दिव्य स्वरूप और अनंत गुणों का वर्णन करता है।
महाभारत का हृदय और वेदों का सार
श्री विष्णु सहस्रनाम महाभारत का हृदय और सार है, और महाभारत को स्वयं इस सहस्रनाम का भाष्य माना जाता है। यह परम सत्य की प्रकृति और महिमा को उसके समस्त पक्षों में प्रस्तुत करता है और जीवन के सर्वोच्च लक्ष्य की प्राप्ति का मार्ग दिखाता है। वेद उस परम सत्ता तक पहुचने के लिये मार्ग प्रशस्त करते हैं, किंतु वेद स्वयं अपरिमित हैं ,उन्हें संपूर्ण रूप से पढ़ना एक सामान्य मनुष्य के लिए संभव नहीं।
अतः महर्षि वेदव्यास ने विभिन्न ऋषियों के ज्ञान से, जैसे मधुमक्खी विभिन्न फूलों से मधु संचित करती है, उन्होंने इन नामों को एकत्र किया। अर्थात विष्णु सहस्रनाम उस विशाल ज्ञान समुद्र की कुंजी है । जिसे एक सामान्य जिज्ञासु भी सीख सकता है।
हिंदू परंपरा में भक्त को प्रतिदिन उपनिषद, गीता, श्री रुद्रम, पुरुष सूक्त और विष्णु सहस्रनाम का यथासंभव पाठ करना चाहिए। परंतु यदि यह सब संभव न हो, तो केवल विष्णु सहस्रनाम का पाठ ही पर्याप्त माना जाता है। अर्थात यह स्तोत्र उस व्यक्ति के लिए भी पूर्ण है, जिसके पास श्रद्धा है किंतु समय कम है ।
श्रद्धा और लोकप्रियता का भूगोल
दक्षिण भारत के कई क्षेत्रों में विष्णु सहस्रनाम के पाठ की परंपरा अत्यंत प्राचीन है। आज भी भोर की पहली किरण के साथ अनगिनत परिवारों से इस स्तोत्र की मधुर ध्वनि सुनाई देती है। उत्तर में काशी के पंडितों ने इसे शास्त्र की भाषा दी , यहाँ यह ज्ञान था। किंतु जैसे-जैसे यह दक्षिण की ओर बढ़ा ज्ञान भक्ति में घुलता गया। कांचीपुरम के मंदिरों में, श्रीरंगम के गर्भगृह में, तिरुपति की पहाड़ियों पर यह स्तोत्र एक अलग ही तीव्रता से विस्तारित हुआ।
महाराष्ट्र की भक्ति परंपरा ने इसे विद्वानों के अध्ययन कक्ष से निकालकर जनसामान्य तक पहुँचाया। बंगाल में चैतन्य महाप्रभु की भक्ति-धारा में यह एक स्थिर आधार की तरह था।
इस तरह,विष्णु सहस्रनाम किसी एक प्रदेश का, किसी एक परंपरा का स्तोत्र नहीं है। यह हिमालय की तराई से लेकर कन्याकुमारी के सागर-तट तक, हर घर में, हर भाषा में, हर पीढ़ी में जीवित रहा।

